Mainpuri: 25 साल बाद जेल से 'आज़ाद' हुआ Azad Khan, भाई Mastan की तपस्या और Police की लापरवाही की कहानी
Azad Khan from Mainpuri acquitted after 25 years in jail. Allahabad High Court slams police for lack of evidence. A heartbreaking story of delayed.
क्या न्याय (Justice) में देरी होना, अन्याय (Injustice) होने जैसा नहीं है? Uttar Pradesh के Mainpuri से एक ऐसी कहानी सामने आई है जो भारत के Judicial System और Police Investigation पर गहरे सवाल खड़े करती है।
एक बेगुनाह इंसान, जिसका नाम Azad Khan है, उसने अपनी
ज़िंदगी के कीमती 25 साल
जेल की कालकोठरी में
बिता दिए। उसका गुनाह?
कुछ नहीं। उसे सिर्फ़ Police के एक जबरन लिए
गए Confession के आधार पर
जेल में डाल दिया
गया था।

Dec-2025 में Allahabad
High Court ने उसे निर्दोष बरी
(Acquit) तो कर दिया, लेकिन
सवाल यह है कि
जो जवानी जेल में बीती,
उसे कौन लौटाएगा? आइये
जानते हैं Azad Khan की यह दर्दनाक
कहानी।
साल
2000: जब बर्बाद हुई एक ज़िंदगी
यह कहानी साल 2000 में शुरू हुई
थी। Mainpuri Police ने Azad Khan को डकैती (Dacoity) के इल्ज़ाम
में गिरफ्तार किया। Police के पास न
तो कोई ठोस सबूत
(Solid Evidence) था और न ही
कोई चश्मदीद गवाह।
कोर्ट
में Police ने सिर्फ़ एक
चीज़ पेश की—Confession। Police ने दावा किया कि
आज़ाद ने अपना गुनाह
कबूल कर लिया है।
हम सब जानते हैं
कि कस्टडी में लिया गया
बयान अक्सर दबाव में लिया
जाता है, लेकिन Trial Court ने इसी को
आधार मानते हुए Azad Khan को आजीवन कारावास
(Life Imprisonment) की
सजा सुना दी।
एक झूठे इल्ज़ाम ने
एक हंसते-खेलते नौजवान को पक्का अपराधी
बना दिया।
भाई
Mastan: एक भाई की 25 साल की लड़ाई
जब सारी दुनिया ने
Azad Khan का साथ छोड़ दिया,
तब उसका भाई Mastan ढाल बनकर
खड़ा रहा। Mastan जानता था कि उसका
भाई बेगुनाह है।
जहाँ
Azad जेल के अंदर अपनी
बेगुनाही की दुआ मांग
रहा था, वहीं बाहर
Mastan वकीलों के चक्कर काट
रहा था, कोर्ट-कचहरी
की धक्के खा रहा था
और पाई-पाई जोड़कर
कानूनी लड़ाई लड़ रहा
था। यह लड़ाई सिर्फ़
आज़ाद की नहीं थी,
यह एक भाई के
विश्वास की लड़ाई थी
जो दो दशकों तक
चली।
Allahabad High Court का ऐतिहासिक
फैसला
आखिरकार,
दिसंबर 2025 में सच्चाई की
जीत हुई। मामला जब
Allahabad High Court पहुंचा,
तो जजों ने Police की थ्योरी की धज्जियां उड़ा
दीं।
कोर्ट
ने पाया कि:
- Police के पास Azad Khan के खिलाफ कोई सबूत (Evidence) नहीं था।
- घटनास्थल से कोई रिकवरी नहीं हुई थी।
- सिर्फ़ Confession
के आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती।
हाई
कोर्ट ने Police की
जांच (Investigation) में गंभीर खामियां
(Serious lapses) पाईं और Azad Khan को बाइज्जत बरी
करने का आदेश दिया।
कोर्ट ने यह भी
माना कि यह "न्याय
की विफलता" (Miscarriage of
Justice) का एक क्लासिक उदाहरण
है।
गरीबी
बनी रिहाई में रोड़ा (Poverty and Delay)
हाई
कोर्ट का फैसला आ
गया, लेकिन Azad Khan की बदनसीबी देखिए
कि वह तुरंत जेल
से बाहर नहीं आ
सका। क्यों? वजह थी—गरीबी
और कानूनी पेंच (Legal Technicalities)।
बरी
होने के बाद भी
रिहाई की कागजी कार्रवाई
और जमानती (Surety) न मिल पाने
के कारण उसे जेल
में कुछ और दिन
बिताने पड़े। यह हमारे
सिस्टम की कड़वी सच्चाई
है कि गरीब आदमी
के लिए न्याय मिलना
तो मुश्किल है ही, न्याय
मिलने के बाद जेल
से बाहर आना भी
आसान नहीं है।
कौन
लौटाएगा वो 25 साल?
आज Azad
Khan जेल से बाहर है,
लेकिन वह अब वो
इंसान नहीं रहा जो
2000 में था। उसकी जवानी,
उसके सपने, उसका समय—सब
कुछ उस जेल की
दीवारों ने सोख लिया।
Mainpuri का
यह केस हम सभी
के लिए एक आईना
है। यह बताता है
कि कैसे Police की
एक गलती और कोर्ट
की धीमी रफ़्तार किसी
की पूरी ज़िंदगी तबाह
कर सकती है। अगर
Mastan जैसा भाई न होता,
तो शायद Azad जेल में ही
दम तोड़ देता।